अशोक क्लब में ‘जेन ऑस्टिन एट 250’ पर बौद्धिक विमर्श; 250 साल बाद भी प्रासंगिक हैं ऑस्टिन की रचनाएं

अशोक क्लब में ‘जेन ऑस्टिन एट 250’ पर बौद्धिक विमर्श; 250 साल बाद भी प्रासंगिक हैं ऑस्टिन की रचनाएं

प्रभा खेतान फाउंडेशन की पहल: प्रख्यात शिक्षाविदों ने ऑस्टिन की साहित्यिक विरासत और सिनेमाई प्रभाव पर डाले विचार

| योगेश शर्मा

जयपुर। प्रसिद्ध लेखिका जेन ऑस्टिन के 250वें जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में जयपुर के ऐतिहासिक अशोक क्लब में एक गरिमामयी साहित्यिक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। ‘जेन ऑस्टिन एट 250: रिफ्लेक्टिंग ऑन हर एंड्यूरिंग लिगेसी’ विषय पर आयोजित इस सत्र में वक्ताओं ने ऑस्टिन के लेखन, उनकी सामाजिक समझ और समकालीन दुनिया में उनकी स्थायी प्रासंगिकता पर गहन मंथन किया। कार्यक्रम का आयोजन प्रभा खेतान फाउंडेशन की ‘सहयोग’ पहल के तहत किया गया।

फ़ोटो टेलीग्राफ टाइम्स

तर्क, विवेक और नारी जीवन का जीवंत चित्रण

​चर्चा की मुख्य वक्ता और संचालक प्रो. सुधा राय रहीं। उन्होंने ऑस्टिन को एक ऐसी लेखिका के रूप में परिभाषित किया जिनका लेखन केवल कहानियां नहीं, बल्कि तर्क और विवेक का दस्तावेज था। सत्र के दौरान प्रो. अंशू शर्मा, प्रो. नरेंद्र कुमार और प्रो. प्रीति अग्रवाल ने भी अपने विचार साझा किए। पैनलिस्ट्स ने बताया कि ऑस्टिन की कहानियां महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी की उन सच्चाइयों से जुड़ी थीं, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता था। उनके किरदारों में दिखने वाली सहजता और असहजता दरअसल उनकी अपनी आंतरिक दुनिया का आईना थी।

निजी अनुभव और वैश्विक प्रभाव

​पैनल ने इस बात पर विशेष प्रकाश डाला कि कैसे ऑस्टिन के परिवार और निजी अनुभव उनके लेखन के सबसे बड़े स्रोत बने। उनकी कहानियों में मौजूद भावनात्मक गहराई और नैतिक स्पष्टता ने उन्हें भौगोलिक सीमाओं से परे वैश्विक पहचान दिलाई। वक्ताओं ने कहा कि आज भी कई भाषाओं में हो रहे उनके अनुवाद और पाठकों की बढ़ती संख्या यह सिद्ध करती है कि महिलाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक भूमिका को लेकर उनका दृष्टिकोण आज के समय में भी उतना ही प्रभावशाली है जितना 250 साल पहले था।

साहित्य से सिनेमा तक का सफर

​चर्चा का एक दिलचस्प हिस्सा ऑस्टिन के उपन्यासों का पर्दे पर रूपांतरण रहा। पैनल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी प्रसिद्ध फिल्मों के साथ-साथ बॉलीवुड की कहानियों पर पड़े उनके प्रभाव को रेखांकित किया। सत्र के दौरान ‘प्राइड एंड प्रेजुडिस’ जैसी क्लासिक रचनाओं के फिल्म रूपांतरणों की छोटी क्लिप्स भी दिखाई गईं, जिससे दर्शकों को यह समझने में आसानी हुई कि कैसे सिनेमा के माध्यम से उनका साहित्य आज की युवा पीढ़ी के बीच भी जीवंत बना हुआ है।

समापन और संवाद

​कार्यक्रम के अंत में श्रोताओं और पैनलिस्ट्स के बीच एक रोचक प्रश्न-उत्तर सत्र हुआ, जिसमें साहित्य प्रेमियों ने ऑस्टिन के किरदारों की आधुनिक व्याख्याओं पर सवाल पूछे। इससे पूर्व, तुषारिका सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया और कार्यक्रम का समापन अजय सिंघा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस अवसर पर शहर के प्रबुद्धजन, साहित्यकार और जेन ऑस्टिन के प्रशंसक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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