अरावली का विनाश पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत, ऐतिहासिक धरोहर को बचाना अनिवार्य: आचार्य माधव शास्त्री

अरावली का विनाश पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत, ऐतिहासिक धरोहर को बचाना अनिवार्य: आचार्य माधव शास्त्री

सोजत सिटी (हरिप्रसाद शर्मा) वैदिक और पौराणिक काल में ‘ऋक्षपर्वतश्रेणी’ के नाम से विख्यात अरावली पर्वतमाला आज विकास के नाम पर विनाश की कगार पर है। कभी रीछों और वन्यजीवों की शरणस्थली रही यह पर्वत श्रृंखला वर्तमान में अवैध और वैध खनन की भेंट चढ़ रही है। इस गंभीर विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए आचार्य माधव शास्त्री ने अरावली के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाने की अपील की है।

मरुस्थल को रोकने में अरावली की ऐतिहासिक भूमिका

​आचार्य माधव शास्त्री ने बताया कि अरावली पर्वतमाला केवल पत्थरों का समूह नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक विभाजक है। इसने मरुस्थल की रेतीली भूमि और पूर्व के उपजाऊ मैदानी भाग (मेवाड़) को अलग कर रखा है।

  • प्राकृतिक अवरोध: अरावली ने सदियों से बढ़ते मरुस्थल को पूर्व की ओर बढ़ने से रोका है।
  • जनजीवन का आधार: प्राचीन काल में मरुभूमि का जल पीने योग्य नहीं था और परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं, लेकिन अरावली की तलहटियों ने ही लोगों को मरुभूमि में निवास करने का साहस और संसाधन प्रदान किए।

सुरक्षा की दृष्टि से अलंघनीय रही है श्रृंखला

​ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए शास्त्री ने कहा कि सुरक्षा की दृष्टि से अरावली हमेशा अलंघनीय रही है। तत्कालीन क्षत्रिय वंशजों ने इसकी रक्षा का दायित्व बखूबी निभाया और सुरक्षा के मद्देनजर इस श्रृंखला की पहाड़ियों पर अनेक अभेद्य दुर्गों का निर्माण करवाया। यह श्रृंखला वीर भूमि की रक्षा के लिए एक प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी रही है, जिसे पूर्वजों ने अपने रक्त से सींचा है।

विकास के नाम पर ‘विनाश’ का खेल

​वर्तमान स्थिति पर प्रहार करते हुए माधव शास्त्री ने कहा कि आज विकास कार्यों के नाम पर पर्वत श्रृंखला को तोड़ा जा रहा है।

  1. अस्तित्व का संकट: कई छोटी-छोटी टेकरियों का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो गया है। खनन के कारण कई पहाड़ केवल अवशेष मात्र रह गए हैं और अनेक को समतल कर दिया गया है।
  2. धार्मिक और सांस्कृतिक क्षति: पवित्र पुष्कर सरोवर के पास स्थित नाग पर्वतमाला (अजापाल श्रृंखला के समीप) को भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया है।
  3. घाटा (दर्रों) का महत्व: जनमानस की आस्था से जुड़े ‘बर का घाटा’ और ‘फुलाद का घाटा’ जैसी पहाड़ियां भी अब सुरक्षित नहीं हैं।

पर्यावरणीय असंतुलन और संरक्षण की अपील

​आचार्य ने चेतावनी दी कि अरावली का क्षरण सीधा पर्यावरणीय असंतुलन का कारण बन रहा है। मनुष्य अपनी अल्पकालिक सुख-सुविधाओं के लिए विनाशकारी कदम उठा रहा है, जो भविष्य के लिए घातक है। उन्होंने सरकार और समाज से अपील की है कि:

    • ​पुरातन ऋक्ष पर्वत श्रृंखला को नष्ट करने के कुप्रयासों पर तत्काल रोक लगाई जाए।
    • ​ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पहाड़ियों का संरक्षण सुनिश्चित हो।
    • ​छोटी-मोटी पहाड़ियों और घाटों (दर्रों) को खनन से मुक्त रखा जाए।

​”अरावली हमारी अमूल्य ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहर है। इसे बचाना हमारा नैतिक कर्तव्य और दायित्व है।” — आचार्य माधव शास्त्री

spot_imgspot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related

सामाजिक सुरक्षा पेंशनर्स जल्द कराएं वार्षिक सत्यापन, किसी की पेंशन बंद नहीं होगी: अविनाश गहलोत

सामाजिक सुरक्षा पेंशनर्स जल्द कराएं वार्षिक सत्यापन, किसी की...

​’विकसित भारत-जीरामजी योजना’ केवल रोजगार नहीं, स्थायी आजीविका की गारंटी: विजय सिंह

​'विकसित भारत-जीरामजी योजना' केवल रोजगार नहीं, स्थायी आजीविका की...