अभाव में जी रहा मजदूर वर्ग और हमारी जवाबदेही

लेखक: गणेश चौधरी

(स्वतंत्र टिप्पणीकार)

​हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी एक मई को हम ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाएंगे। इस दिन औपचारिक कार्यक्रमों में मजदूरों के हितों, उनके सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक उत्थान की बड़ी-बड़ी बातें होंगी। लेकिन विचारणीय विषय यह है कि क्या राष्ट्र निर्माण में अपना जीवन खपा देने वाले इस वर्ग के उत्थान के लिए साल का महज एक दिन पर्याप्त है? शायद ही कोई जागरूक नागरिक इस बात से सहमत होगा।

अदृश्य बुनियाद के असली शिल्पी

हमें यह अवश्य याद रखना होगा कि आज जो गगनचुंबी इमारतें हमें गौरव का अहसास कराती हैं, उद्योगों के माध्यम से जो आर्थिक ढांचे का पहिया घूम रहा है और रेल-सड़क जैसी जो बुनियादी अवसंरचनाएं हम देख रहे हैं, यह सब इसी मजदूर वर्ग के कठिन परिश्रम की बदौलत है।

ऐतिहासिक उपेक्षा का दंश

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो दिल्ली सल्तनत और राजा-महाराजाओं के शासन से लेकर अंग्रेजों के दौर तक, मजदूर और कामगार वर्ग हमेशा हाशिए पर ही रहा है। दुर्भाग्य यह है कि देश की आजादी के 75 वर्षों के बाद भी इस वर्ग की जीवन शैली में वह अपेक्षित बदलाव नहीं आ पाया है, जिसका सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था।

​हाल ही में हमने महात्मा ज्योतिबा फुले एवं संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाई है। इन महापुरुषों का मजदूरों के अधिकारों को सुरक्षित करने में अतुलनीय योगदान रहा है। डॉ. अंबेडकर ने मजदूरों के हितों के लिए ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ का गठन किया था। उन्होंने ही काम के घंटे निश्चित करने और महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) जैसे न्यायोचित हक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन आज भी स्थिति यह है कि बड़ी-बड़ी पूंजीवादी संस्थाओं में मजदूरों का शोषण बदस्तूर जारी है और उनके वेतन में वृद्धि ‘ऊंट के मुंह में जीरे’ के समान होती है।

असंगठित क्षेत्र: संघर्ष और सरकारी दावे

इस समय सबसे अधिक ध्यान असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) में काम करने वाले मजदूरों पर देने की आवश्यकता है, जो गुमनामी के अंधेरे में जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाकर सम्मानपूर्वक जीवन जीने का हक हमारा संविधान देता है।

​हालाँकि केंद्र सरकार ने अगस्त 2021 में ‘ई-श्रम पोर्टल’ शुरू किया है ताकि कामगारों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव क्या होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है। फिलहाल स्थिति को देखते हुए अदम गोंडवी की ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं:

“तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,

मगर ये बातें झूठी हैं, ये दावा किताबी है।”

 

राष्ट्र निर्माण और हमारा व्यवहार

आज हम ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था’ और ‘विकसित भारत 2047’ जैसे बड़े लक्ष्यों का सपना देख पा रहे हैं, तो इसके पीछे उस किसान और मजदूर का खून-पसीना है जो गाँव की गलियों और समाज के अंतिम छोर पर खड़ा है। जब तथाकथित शिक्षित वर्ग व्यवस्था की आलोचना करते हुए यह कहता है कि “आजादी के इतने वर्षों में कुछ नहीं हुआ”, तो वे अनजाने में उस मेहनतकश मजदूर की तौहीन करते हैं जिसने शून्य से इस देश को बनाया है।

संवेदनहीनता का परिचय

लेख का एक कड़वा सच समाज का व्यवहार भी है। शिक्षित कहलाने वाले कई लोग अपने पालतू कुत्तों के साथ तो अत्यंत सभ्य व्यवहार करते हैं, लेकिन एक मजदूर या कामगार को धिक्कार भरी नजरों से देखते हैं। यह विडंबना ही है कि जिस किसान और मजदूर का उगाया अन्न हम चाव से खाते हैं, उन्हें समाज में वह सम्मान नहीं मिल पाता जिसके वे हकदार हैं।

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