अजमेर में तलवारों से हाईदौस की परंपरा जीवंत: इमाम हुसैन की शहादत को अनूठे अंदाज़ में दी श्रद्धांजलि
एशिया में सिर्फ अजमेर और पाकिस्तान के हैदराबाद में निभाई जाती है यह परंपरा
Edited By : नरेश गुनानी
टेलीग्राफ टाइम्स
जुलाई 07,2025
(हरिप्रसाद शर्मा, अजमेर) — मोहर्रम के मौके पर अजमेर में मुस्लिम समाज द्वारा निभाई जाने वाली एक अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा रविवार को एक बार फिर जीवंत हो उठी। हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करते हुए ख्वाजा की नगरी अजमेर में नंगी तलवारों से हाईदौस खेला गया। यह परंपरा पूरे एशिया में केवल दो स्थानों पर देखने को मिलती है — भारत में अजमेर और पाकिस्तान में हैदराबाद।
500 वर्षों पुरानी परंपरा मोहर्रम कन्वीनर एडवोकेट अब्दुल शाहिद के अनुसार, यह परंपरा पिछले लगभग 500 वर्षों से निभाई जा रही है, जिसे दी पंचायत अंदरकोटियान के नेतृत्व में अंजाम दिया जाता है। विशेष बात यह है कि इस परंपरा में पुलिस प्रशासन भी सहयोग करता है। स्वयं अजमेर पुलिस द्वारा 100 लोगों को तलवारें उपलब्ध कराई जाती हैं, ताकि वे हाईदौस की रस्म को निभा सकें।
खुशकिस्मती मानते हैं घायल होना हाईदौस के दौरान कई बार लोग तलवार की चोटों से घायल भी हो जाते हैं, लेकिन कोई भी न तो पुलिस में शिकायत करता है, न ही कोई मामला दर्ज होता है। घायल लोग इसे अपनी “खुशकिस्मती” मानते हैं कि उन्हें इमाम हुसैन की याद में खुद को लहूलुहान करने का अवसर मिला। यह भाव दर्शाता है कि समुदाय आज भी कर्बला की कुर्बानी को किस प्रकार दिल से याद करता है।
तलवारों की छांव में मातम और आस्था हाथों में चमचमाती तलवारें, दिलों में जोश-ए-हुसैनी, और होंठों पर “या हुसैन” की सदा लिए युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने कर्बला की लड़ाई को स्मरण करते हुए इस परंपरा को निभाया। ढोल-ताशों की मातमी धुनों के साथ जब डोले शरीफ को कंधों पर उठाया गया, तो पूरा क्षेत्र मातम और श्रद्धा के भाव से भर उठा।
तोप की गर्जना से हुआ हाईदौस का आगाज़ परंपरा के अनुसार, हाईदौस की शुरुआत तोपों की गर्जना से होती है। इसके बाद सैकड़ों लोग तलवारें हाथों में लिए जुलूस में शामिल होते हैं। इस दौरान डोले शरीफ को सैराब करने की रस्म भी पूरी की जाती है।
विशेष सुरक्षा व्यवस्था अजमेर प्रशासन द्वारा कार्यक्रम के दौरान विशेष सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। पुलिस, प्रशासन और आयोजन समिति के समन्वय से यह परंपरा शांतिपूर्वक और भव्य रूप से संपन्न हुई।
सिर्फ अंदरकोटियान समाज निभाता है परंपरा यह परंपरा सिर्फ अंदरकोट कोटियान पंचायत समाज द्वारा निभाई जाती है और इसे उनकी धार्मिक आस्था और इमाम हुसैन के प्रति अगाध श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। इस अनोखे आयोजन ने एक बार फिर यह साबित किया कि अजमेर न केवल सूफी परंपरा का केंद्र है, बल्कि मोहर्रम के गम को निभाने का सबसे अलहदा अंदाज़ भी यहीं देखने को मिलता है।

