हरिप्रसाद शर्मा पुष्कर/अजमेर। अजमेर स्थित विश्व प्रसिद्ध ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह परिसर में हिंदू मंदिर होने के दावे से जुड़े कानूनी विवाद में अदालत ने एक महत्वपूर्ण मोड़ दिया है। सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट, अजमेर (पश्चिम) ने इस बहुचर्चित मामले में कई नए पक्षों को शामिल करने की अनुमति दी है, वहीं बेवजह कानूनी प्रक्रिया में बाधा डालने वालों पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारी जुर्माना भी लगाया है।
नए पक्षकारों की एंट्री, एएसआई और अल्पसंख्यक विभाग भी शामिल
‘भगवान श्री संकटमोचन व अन्य बनाम दरगाह कमेटी अजमेर व अन्य’ के इस मामले में अदालत ने विवाद की प्रकृति को देखते हुए सभी संबंधित पक्षों की उपस्थिति को अनिवार्य माना है।
- वादी पक्ष: अदालत ने हिंदू सेना के विष्णु गुप्ता और राजवर्धन सिंह परमार को वादी पक्ष में शामिल होने की अनुमति दी है।
- प्रतिवादी पक्ष: दरगाह से जुड़ी संस्थाओं में मोईनिया फखरिया चिश्ती खुद्दाम ख्वाजा साहिब सैयदजादगान, दीवान सैयद जैनुल आबेदीन और अंजुमन यादगार चिश्तियां शेखजादगान को प्रतिवादी बनाया गया है।
- सरकारी विभाग: मामले की ऐतिहासिक संवेदनशीलता को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अल्पसंख्यक विभाग (दरगाह कमेटी से संबंधित) को भी पक्षकार बनाया गया है।
कोर्ट का कड़ा संदेश: 9 आवेदकों पर 2.70 लाख का जुर्माना
सुनवाई के दौरान अदालत ने उन लोगों को सख्त चेतावनी दी जो बिना किसी ठोस आधार के मामले में पक्षकार बनने की कोशिश कर रहे थे। अदालत ने माना कि ऐसे आवेदनों से न्यायिक प्रक्रिया में देरी होती है और समय की बर्बादी होती है।
- अदालत ने 9 आवेदनों को खारिज कर दिया।
- प्रत्येक प्रार्थी पर 30-30 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
- जुर्माने की कुल 2.70 लाख रुपये की राशि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, अजमेर में जमा कराने के आदेश दिए गए हैं।
वादी पक्ष को संशोधित दस्तावेज पेश करने के निर्देश
न्यायालय ने वादी पक्ष को निर्देशित किया है कि वे अगली सुनवाई से पूर्व संशोधित वाद पत्र (Amended Plaint) पेश करें। साथ ही, सभी नए बनाए गए पक्षकारों को वाद पत्र और संबंधित दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराने के आदेश भी दिए गए हैं ताकि वे अपना पक्ष मजबूती से रख सकें।
अब 22 जुलाई पर टिकी निगाहें
अदालत ने जानकारी दी कि आदेश 7 नियम 11 सीपीसी (जिसके तहत वाद की पोषणीयता को चुनौती दी जाती है) से जुड़े प्रार्थना पत्रों पर बहस पहले ही पूरी हो चुकी है। अब अन्य लंबित प्रक्रियाओं और नए पक्षों की दलीलों पर विचार किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को नियत की गई है।
ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व से जुड़े इस मामले पर न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इस फैसले का असर भविष्य की कई कानूनी और सामाजिक व्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।