अंबुजा सीमेंट्स के कोल ब्लॉक के लिए वन भूमि परिवर्तन का तीव्र विरोध, ग्रामीणों ने केंद्र सरकार को भेजी आपत्ति

ब्यूरो चीफ़ : गणपत चौहान छत्तीसगढ़ 

छाल/धरमजयगढ़। धरमजयगढ़ वन मंडल के अंतर्गत पुरुंगा क्षेत्र में प्रस्तावित अंबुजा सीमेंट्स (अडानी समूह) की भूमिगत कोल ब्लॉक परियोजना विवादों के घेरे में आ गई है। परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर वन भूमि को गैर-वन प्रयोजन हेतु परिवर्तित करने के प्रस्ताव का स्थानीय ग्रामीणों ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। ग्राम पंचायत पुरुंगा, सामरसिंघा और तेंदुमुड़ी के निवासियों ने एकजुट होकर भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को औपचारिक आपत्ति पत्र भेजकर इस प्रस्ताव को तत्काल निरस्त करने की मांग की है।

621 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि दांव पर

​जानकारी के अनुसार, कंपनी द्वारा परियोजना के लिए कुल 869.025 हेक्टेयर क्षेत्र चिन्हित किया गया है। इसमें से 621.331 हेक्टेयर वन भूमि को खनन कार्यों के लिए डायवर्ट करने हेतु 25 जुलाई 2025 को आवेदन प्रस्तुत किया गया था। ग्रामीणों का तर्क है कि इतनी विशाल मात्रा में वन भूमि का विनाश क्षेत्र की पारिस्थितिकी को पूरी तरह तबाह कर देगा।

संवैधानिक प्रावधानों और पेसा कानून का उल्लंघन

​विरोध कर रहे ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि यह पूरा क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा (PESA) कानून के दायरे में आता है। इन प्रावधानों के तहत किसी भी खनन या औद्योगिक गतिविधि के लिए ग्राम सभा की पूर्व अनुमति अनिवार्य है। ग्रामीणों ने बताया कि:

  • तेंदुमुड़ी: 18 अक्टूबर 2025 को विरोध प्रस्ताव पारित।
  • सामरसिंघा: 19 अक्टूबर 2025 को सर्वसम्मति से विरोध।
  • पुरुंगा: 19 अक्टूबर 2025 को आयोजित बैठक में खनन परियोजना को खारिज किया गया। इन ग्राम सभाओं में पहले ही खनन के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं, बावजूद इसके प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है।

जैव विविधता और हाथियों के आवास पर संकट

​प्रस्तावित खनन क्षेत्र में लगभग 314 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि शामिल है, जो घने जंगलों और जैव विविधता से संपन्न है। यह क्षेत्र जंगली हाथियों का स्थायी रहवास माना जाता है। ग्रामीणों ने चिंता व्यक्त की है कि:

  1. मानव-वन्यजीव संघर्ष: हाथियों के प्राकृतिक गलियारे में खनन से हाथियों का रिहायशी इलाकों की ओर पलायन बढ़ेगा, जिससे जान-माल का नुकसान हो सकता है।
  2. ध्वनि एवं भूमि प्रदूषण: भूमिगत खनन के दौरान भारी मशीनों का उपयोग, निरंतर ड्रिलिंग और विस्फोटों से न केवल ध्वनि प्रदूषण होगा, बल्कि भूमि धंसने (Land Subsidence) का खतरा भी बना रहेगा।
  3. जल स्रोतों का विनाश: क्षेत्र में मौजूद प्राकृतिक जल स्रोत सूख सकते हैं, जिसका सीधा असर स्थानीय कृषि और आजीविका पर पड़ेगा।

आदिवासी संस्कृति और आजीविका पर प्रहार

​आदिवासी समुदायों का कहना है कि जल, जंगल और जमीन उनकी संस्कृति की पहचान हैं। वन भूमि के परिवर्तन से उनके पारंपरिक अधिकारों का हनन होगा। ग्रामीणों ने मंत्रालय से अपील की है कि जनभावनाओं को सर्वोपरि रखते हुए इस विनाशकारी परियोजना को रोका जाए।

​वर्तमान में इस मुद्दे को लेकर पूरे धरमजयगढ़ क्षेत्र में जनचर्चा तेज है। अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी हैं कि क्या मंत्रालय कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देगा या ग्रामीणों के संवैधानिक अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा करेगा।

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